महाराणा प्रताप भाग-26

महाराणा प्रताप भाग-26

और अगले ही रोज़ महाराणा को उन लोगों के कमलमीर पहुँचने का समाचार मिला। महाराणा कुछ सैनिक साथ लेकर मिलने ले लिए चल दिए।

मिलने की व्यवस्था वहां के राजदरबार या महलों में न कर, एक सुन्दर, सुसज्जित शामियाने में की गई थी। महाराणा के बैठने के लिए कुशाओं के बने मोढ़े (आसन) व्यवस्था थी,जब कि राजा टोडरमल के लिए उचित राजसी आसन था।

ठीक समय पर महाराणा वहाँ पहुँच गये। दोनों ने एक-दूसरे का उचित सम्मान किया। चन्दावत कृष्णसिंह, मेवाड़ के महामंत्री, अन्य सामंत, सरदार और कुँवर अमरसिंह भी वहीँ उपस्थित थे। आदर-सत्कार के बाद महाराणा ने पूछा —

“कहिये, राजा साहब! स्वागत-सत्कार में किसी प्रकार की त्रुटि तो नहीं रह गई ? यदि रह गई हो, तो क्षमा करना, क्योंकि सारी व्यवस्था अमर ने की है और वह अभी बच्चा  है।”



“काफी समझदार हो गया है कुँवर अमरसिंह, महाराणा !” राजा टोडरमल ने कहा — “यहाँ पहुंचकर मुझे ऐसे लग रहा है, जैसे मै अपने घर में ही पहुँच गया हूँ।”

“काश ! आप लोगो ऐसा समझ पाते !” महाराणा ने कहा — “यदि आप लोग मेवाड़ को अपना घर समझ पाते, तो फिर आज देश के नक़्शे में कोई और ही रंग भरा जा रहा होता, राजा साहब !”

“महाराणा !” राजा  टोडरमल ने गंभीरता से देखते हुए कहा —  “मै आपका अभिप्राय अच्छी तरह से समझता हूँ; आपका दर्द भी समझता हूँ, महाराणा ! पर यह भी तो आप समझिये, कि आज समय कौन-सा जा है ? आज हम लोगों में वह शक्ति और साहस कहाँ रह गया है गया है ? हम लोगों के पूर्वजों ने जो राजनीतिक भूलें की है, अब उनके सुधरने का कोई आसार दिखाई नहीं देता। ”

“यह तो अपने-अपने विचार हैं, राजा साहब !” महाराणा ने भी गम्भीर भाव से कहा — “खैर, जाने दीजिये ! आपने यहाँ तक आने का कष्ट किया, यही बहुत है। आज्ञा कीजिये, वनवासी प्रताप आपकी क्या सेवा कर सकता है ?”

“महाराणा !” राजा टोडरमल ने उनके कुशा  आसन की तरफ देखते हुए कहा –“मुझे आपने इतना बढ़िया सोने का आसन बैठने के लिए दे रखा है। आप स्वयं कुशा (घास) के आसन पर बैठे हैं। आप चाहें तो सोने और हीरों से जड़े राजसिंहासन पर विराजमान हो सकते हैं। आप पर सारे भारत का वैभव न्यौछावर हो सकता है। आप सचमुच मानवता के गौरव बन सकते हैं।”

“वह कैसे, राजा साहब ?” महाराणा ने गम्भीरता से पूछा।

“महाबली सम्राट अकबर के साथ मित्रता करके। ” राजा ने उत्तर दिया।

“हमें उनसे मित्रता करके बड़ी ख़ुशी होगी, राजा साहब !” महाराणा ने मुस्कराते हुए कहा — “हम भी नाहक लड़ना-मरना नहीं चाहते। पर सबको अपने प्रदेश में स्वतंत्रतापूर्वक जीवित रहने का अधिकार है। क्या आपके सम्राट एक शर्त पर हमारी मित्रता स्वीकार करने के लिए तैयार हो जायेंगे ?”

“मैं आपका मतलब नहीं समझा, महाराणा !” राजा टोडरमल ने उनकी तरफ देखते हुए पूछा।

“मतलब बिलकुल सीधा और स्पष्ट है, राजा साहब !” महाराणा ने समझाते हुए कहा — “मेवाड़ हमारा है और सारे का सारा हमारा है। सम्राट अकबर हमारी वस्तु हमारे हवाले कर दें, हमारी उनसे कोई शत्रुता नहीं।”

“यह भी हो सकता है, महाराणा !” राजा ने कहा  — ” साथ आगरा चलिये….।”

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